उत्तर प्रदेश की राजनीतिक फिजा में एक बार फिर से ‘जंगलराज बनाम सुशासन’ की पुरानी बहस ने जोर पकड़ लिया है। पड़ोसी राज्य बिहार के विधानसभा चुनावों में एनडीए द्वारा अपनाई गई सफल चुनावी रणनीति और ‘पुराने दौर बनाम आज के दौर’ (Then vs Now) के तुलनात्मक मॉडल को अब उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों के लिए भी मुख्य हथियार बनाया जाने लगा है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) एक बार फिर से विपक्षी समाजवादी पार्टी (SP) के पिछले शासनकाल की कानून-व्यवस्था, माफियाराज और तुष्टीकरण के मुद्दों को हवा देकर मतदाताओं के बीच पुरानी यादें ताजा करने की जुगत में है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी और विपक्षी दल इसे बीजेपी की नाकामी और विकास के मुद्दों से ध्यान भटकाने की चाल बता रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्तर प्रदेश में बिहार जैसी रणनीति सफल हो पाएगी और कानून-व्यवस्था का यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा आखिर किसके पक्ष में चुनावी पलड़ा झुकाएगा?
क्या है ‘बिहार प्लेबुक’ फॉर्मूला और क्यों यूपी चुनाव में इसकी हो रही है चर्चा?
बिहार के हालिया विधानसभा चुनावों में एनडीए गठबंधन ने विकास के दावों के साथ-साथ पुराने दौर के अपराध और अव्यवस्था के विमर्श को जनता के बीच मजबूती से रखा था, जिसे वहां की जनता ने भारी समर्थन दिया था। इसी तर्ज पर अब उत्तर प्रदेश में भी सत्तारूढ़ दल ने पुरानी सपा सरकार के दौरान की घटनाओं, दंगों, कानून-व्यवस्था की बदहाली और माफियाओं के बेखौफ अंदाज को मौजूदा योगी सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ और विकास कार्यों के सामने रखकर कैंपेन की रूपरेखा तैयार करनी शुरू कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य आम मतदाताओं के मन में अतीत के उस डर और असुरक्षा के माहौल को दोबारा जागृत करना है, जिससे वे 2017 से पहले जूझते रहे थे।
बीजेपी का ‘डेटा और तुलनात्मक कैंपेन’: माफिया पर शिकंजा बनाम पुरानी अराजकता
उत्तर प्रदेश में चुनावी जमीन मजबूत करने के लिए बीजेपी नेताओं और रणनीतिकारों ने खुलेआम मंचों से पुरानी सपा सरकार के कार्यकाल को याद दिलाना शुरू कर दिया है। सरकार के प्रमुख मंत्रियों और नेताओं का कहना है कि जनता भूली नहीं है कि किस तरह पहले हर जिले में एक विशेष माफिया का राज हुआ करता था और आए दिन सांप्रदायिक दंगे आम बात थी। इसके विपरीत, पिछले कुछ वर्षों में राज्य में एक्सप्रेसवे का जाल, बेहतर बिजली आपूर्ति, निवेश का माहौल और माफियाओं पर बुलडोज़र कार्रवाई को मुख्य उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है। पार्टी का मानना है कि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का यह मुद्दा महिलाओं, व्यापारियों और आम जनता के बीच सबसे बड़ा भरोसेमंद आधार है, जो चुनाव के वक्त गेमचेंजर साबित होता है।
समाजवादी पार्टी का पलटवार: ‘पुराने किस्से सुनाने वाले खुद वर्तमान में फेल’
दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने इस रणनीति पर कड़ा पलटवार करते हुए कहा है कि बीजेपी के पास दिखाने के लिए अपने वर्तमान कार्यकाल का कोई ठोस काम नहीं बचा है, इसलिए वह बार-बार इतिहास के पन्ने पलटने के लिए मजबूर है। सपा नेताओं का तर्क है कि जनता अब बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक और बुनियादी समस्याओं से त्रस्त है और वह इन पुराने मुद्दों से गुमराह होने वाली नहीं है। हाल ही में संपन्न हुए विधान परिषद (MLC) चुनावों के नतीजों का हवाला देते हुए विपक्षी खेमा यह दावा कर रहा है कि जनता अब वर्तमान के आर्थिक और सामाजिक संकटों पर वोट कर रही है, न कि पुराने डरावने विमर्शों पर।
कानून-व्यवस्था का यह मुद्दा अंततः किसके पक्ष में डालेगा वोट?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश जैसे बहुआयामी राज्य में कानून-व्यवस्था का मुद्दा हमेशा से एक धारदार हथियार रहा है। एक वर्ग जहां सरकार की सख्त प्रशासनिक पकड़ और सुरक्षित माहौल को अपनी पहली पसंद मानता है, वहीं दूसरा वर्ग महंगाई और रोजगार जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देता है। चुनाव की तारीखें जैसे-जैसे नजदीक आएंगी, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या जनता का झुकाव अतीत की तुलना और सुरक्षा की गारंटी की तरफ रहता है या फिर विपक्षी दलों द्वारा उठाए जा रहे महंगाई-बेरोजगारी के नए मुद्दे इस ‘बिहार वाली चाल’ को मात दे पाते हैं।
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