चेहरे पर उदासी, आंखों में आंसू और हाथ में तराजू… देश के लिए गोल्ड मेडल जीतने वाली पैरा एथलीट दाने-दाने को मोहताज

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  • झारखंड की पैरा थ्रो बॉल खिलाड़ी पुष्पा मिंज ने थाईलैंड, कंबोडिया और नेपाल जैसे देशों में गोल्ड-सिल्वर मेडल जीते हैं 
  • लेकिन इन दिनों वह आजीविका के लिए रांची में सब्जी बेच रही हैं. उन्होंने सरकार से मांग की है कि सरकार उनकी मदद करे तो वह अपने गेम पर फोकस करके आगे और भी देश का नाम ऊंचा कर सकती हैं
रांची:झारखंड, जल -जंगल -जमीन और अपने प्राकृतिक उन्नत किस्म के खनिजों के लिए तो देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी विख्यात है. झारखंड में न सिर्फ उच्च कोटि के खनिज मिलते हैं बल्कि यहां की मिट्टी में कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी भी उपजे हैं. जिन्होंने विश्व स्तर पर भारत को अलग पहचान दिलाई है. चाहे क्रिकेट के सफलतम कप्तानों में शुमार महेंद्र सिंह धोनी की बात हो या सौरभ तिवारी की पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी वरुण एरॉन की. क्रिकेट के अलावा हॉकी और तीरंदाजी में भी झारखंड ने दर्जनों अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी देकर देश में अपने प्रतिभा का लोहा मनवाया है.
इसी झारखंड की राजधानी रांची के नरकोपी की रहने वाली, एक इंटरनेशनल प्लेयर हैं जिन्होंने थाईलैंड-कंबोडिया और नेपाल में जाकर भारत के लिए इंटरनेशनल गोल्ड मेडल जीता है. विदेशी धरती पर तिरंगे झंडे को गर्व से लहराया है. लेकिन सिस्टम की मार ऐसी कि पैरा थ्रो बॉल की इंटरनेशनल खिलाड़ी, पुष्पा मिंज सरकार के उदासीन रवैये के कारण अपने जीवन-यापन के लिए आज राजधानी रांची के कडरू ओवर ब्रिज के नीचे सड़क पर बैठकर सब्जी बेच रही हैं.
आंखों में आंसू लेकिन हौसले बुलंद…
राजधानी रांची की रहने वाली पैरा थ्रो बॉल की अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी पुष्पा मिंज ने  क्राइम खबर से  बात करते हुए बताया कि वह अनाथ हैं. उनके माता-पिता का पूर्व में ही निधन हो चुका है. बड़े भाई और भाभी है लेकिन उनसे ज्यादा वास्ता नही है. विदेशी धरती पर जाकर, पैरा थ्रो बॉल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंबोडिया थाईलैंड और नेपाल जैसे देश में गोल्ड और सिल्वर मेडल जीतने के बावजूद आज वह पहचान की मोहताज हैं. पुष्पा इन दिनों दाने-दाने को तरस रहीं हैं और मुफलिसी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं.
अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी पुष्पा मिंज ने कहा कि क्रिकेट, हॉकी या दूसरे खेलों में अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों पर सरकार ध्यान देती है. सरकारी नौकरी मिलती है. आर्थिक सहायता मिलती है. लेकिन, उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है? जबकि वह पैरा थ्रो बॉल की अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हु. उन्होंने विदेशी जमीन पर भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता है. इसका खर्च भी उन्होंने खुद ही उठाया था.
एक पैर से दिव्यांग है पुष्पा
पुष्पा ने बताया कि थाईलैंड, कंबोडिया और नेपाल जाने के लिए प्लेन के टिकट का किराया भी कर्ज लेकर उन्हें ही चुकाना पड़ा. पुष्पा मिंज एक पैर से दिव्यांग हैं, लेकिन हौसलों से इतनी मजबूत है कि अभी और देश के लिए गोल्ड मेडल जीतने की तमन्ना है. बस सरकार से चाहती हैं कुछ आर्थिक मदद और एक नौकरी… ताकि अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी होकर भी वह सड़क पर हमेशा सब्जी बेचकर अपना जीवन-यापन न करें. आर्थिक तंगी और सब्जी बेचने के काम की वजह से वह अपने गेम पर फोकस नहीं कर पा रही हैं.
खेल के साथ-साथ पैरा थ्रो बॉल की इंटरनेशनल प्लेयर पुष्पा मिंज पढ़ाई में भी अव्वल हैं. उन्होंने भूगोल में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. उन्होंने बताया कि नेपाल में आयोजित पैरा थ्रो बॉल इंटरनेशनल चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता है. थाईलैंड में इंटरनेशनल चैंपियनशिप में भी स्वर्ण पदक, कंबोडिया में भी उन्होंने पैरा थ्रो बॉल प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल, इसके अलावा एशियाई स्तर पर हुई पैरा थ्रो बॉल प्रतियोगिता में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया है. पुष्पा मिंज ने बताया कि राज्य स्तर और नेशनल लेवल पर दर्जनों गोल्ड-सिल्वर मेडल वह जीत चुकी हैं.
200-300 रुपये कमाती हैं रोज
पुष्पा इन दिनों अपनी आजीविका चलाने के लिए रेलवे लाइन के किनारे सुबह 6:00 से 11:00 तक सब्जी बेचती हैं और इससे वह₹ 200 से ₹300 कमा लेती हैं. जिससे घर का किराया देने से लेकर अपनी प्रेक्टिस जारी रखने का खर्च उठाती हैं.
पुष्पा मिंज ने बताया कि इतनी उपलब्धियां हासिल करने के बावजूद उन्हें अपने गेम्स में जाने के लिए प्लेन का किराया तक कर्ज लेकर चुकाना पड़ा है. अब तक वह लगभग 5 से 6 लाख रुपए कर्ज ले चुकी हैं. कर्ज लेकर वह देश के लिए गोल्ड मेडल जीत रहीं हैं और विदेशों में भारत का झंडा बुलंद कर रही हैं. शायद सरकार इस अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी को थोड़ी आर्थिक मदद कर दे तो वह झारखंड समेत पूरे देश का नाम पहले की तरह रोशन करती रहेंगी
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