पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य और राजनयिक तनाव के बीच रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) से जुड़ी एक बड़ी और दूरगामी खबर सामने आई है। ईरान सरकार ने घोषणा की है कि वह होर्मुज की खाड़ी के इस संकरे समुद्री मार्ग में भारतीय व्यावसायिक जहाजों पर आवाजाही की कोई पाबंदी लागू नहीं करेगा। हालांकि, इस ऐतिहासिक फैसले के आते ही पड़ोसी देश पाकिस्तान में हड़कंप मच गया है। इस्लामाबाद जो खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ (Mediator) के रूप में पेश करने की कोशिशों में जुटा था, उसे ईरान के इस रुख से भारी कूटनीतिक झटका लगा है। पाकिस्तानी हुक्मरान और वहां का मीडिया इस बात पर बुरी तरह बौखलाया हुआ है कि इस्लामाबाद की लगातार जारी बातचीत और कथित मध्यस्थता प्रयासों को किनारे रखते हुए तेहरान ने नई दिल्ली को प्राथमिकता दी और पाकिस्तान को किसी भी प्रकार का विशेष संरक्षण या छूट देने से साफ इनकार कर दिया।
होर्मुज की खाड़ी का रणनीतिक महत्व और ईरान द्वारा भारत को दी गई खास रियायत
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे व्यस्त और रणनीतिक ऊर्जा गलियारा माना जाता है, जहां से वैश्विक समुद्री कच्चे तेल का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। हालिया वैश्विक और क्षेत्रीय तनावों के बीच ईरान ने अमेरिकी और पश्चिमी मित्र देशों के जहाजों की आवाजाही को कड़ाई से सीमित कर दिया था। इसी बीच, तेहरान के आधिकारिक सूत्रों ने साफ कर दिया कि भारत, चीन, कतर और इराक जैसे देशों के जहाजों को इस जलडमरूमध्य में पूर्ण छूट और सुरक्षित मार्ग प्रदान किया जाएगा। भारत के साथ अपने ऐतिहासिक व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों का हवाला देते हुए ईरान ने स्पष्ट किया कि भारत की ऊर्जा और दवा आवश्यकताएं निर्बाध रूप से जारी रहेंगी। इस छूट के बाद भारतीय तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों को फारस की खाड़ी में किसी भी तरह की अनिश्चितता या नौसैनिक हमले का खतरा नहीं रहेगा, जो भारत की राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एक बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है।
मध्यस्थता का राग अलापने वाले पाकिस्तान की खुली पोल और इस्लामाबाद में नाराजगी
दूसरी तरफ, पाकिस्तान जो अमेरिका-ईरान तनाव के बीच खुद को एक वैश्विक शांतिदूत और मध्यस्थ के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा था, इस घटनाक्रम से बुरी तरह बिलबिला उठा है। पाकिस्तान का दावा था कि वह तेहरान और वाशिंगटन के बीच गुप्त वार्ता और तनाव कम करने की कोशिशों में अहम भूमिका निभा रहा है। लेकिन जब तेहरान ने व्यावहारिक और ठोस रियायतों की घोषणा की, तो उसमें पाकिस्तान का नाम तक शामिल नहीं था। पाकिस्तानी मीडिया और रक्षा विश्लेषकों का गुस्सा इस बात पर फूट पड़ा है कि संकट की घड़ी में पाकिस्तान के जहाजों को ईरान की ओर से कोई खास रियायत या गारंटी नहीं दी गई, जबकि भारत जिसने किसी भी सैन्य गुटबाजी का हिस्सा न बनते हुए केवल स्वतंत्र और गुटनिरपेक्ष कूटनीति अपनाई, उसे सबसे बड़ा कूटनीतिक फायदा मिल गया।
पाकिस्तान की बौखलाहट के पीछे की असली वजह और आर्थिक झटके का डर
इस्लामाबाद की बौखलाहट सिर्फ कूटनीतिक उपेक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे आर्थिक और रणनीतिक कारण भी हैं। पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों और कच्चे तेल के आयात के लिए पूरी तरह से इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है। यदि होर्मुज की खाड़ी में पाकिस्तानी जहाजों या उससे जुड़े कार्गो को किसी भी तरह का जोखिम उठाना पड़ता है, तो वहां ईंधन का संकट खड़ा हो जाएगा और पहले से बदहाल पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को संभालना नामुमकिन हो जाएगा। इसके अलावा, पाकिस्तान को यह डर भी सता रहा है कि ईरान और भारत का बढ़ता आपसी तालमेल अरब सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के रणनीतिक प्रभाव को और अधिक मजबूत करेगा, जिससे इस पूरे समुद्री क्षेत्र में पाकिस्तान का कूटनीतिक महत्व और भी कम हो जाएगा।
भारत की संतुलित विदेश नीति और ग्लोबल साउथ में बढ़ता कूटनीतिक कद
ईरान के इस कदम को भारत की स्वतंत्र, संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति का एक बड़ा प्रमाण माना जा रहा है। नई दिल्ली ने पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद हमेशा तेहरान के साथ अपने संवाद के रास्ते खुले रखे हैं। चाबहार बंदरगाह परियोजना से लेकर ऊर्जा व्यापार तक भारत और ईरान के संबंध हमेशा स्थिर रहे हैं। यही वजह है कि जब खाड़ी के इस मुहाने पर युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं, तब भी ईरान ने भारत के हितों की रक्षा करने का भरोसा दिया है। भारत की इस रणनीतिक सफलता ने न केवल घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति और कीमतों को लेकर बनी अनिश्चितता को खत्म किया है, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की आवाज को नकारा नहीं जा सकता।
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