भारतीय संस्कृति और लोकतांत्रिक परंपराओं में राष्ट्रपति भवन का दरवाजा हमेशा से आम नागरिकों के लिए प्रेरणा और अपनत्व का केंद्र रहा है। इस बार दीपावली का पावन पर्व झारखंड के एक साधारण ग्रामीण परिवार के लिए जीवन का सबसे बड़ा और कभी न भूलने वाला पल बन गया। झारखंड के चतरा जिले की रहने वाली कलावती देवी और उनके पति दिलीप महतो के जीवन में इस साल की दिवाली राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के असीम स्नेह और आत्मीयता के कारण इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। राष्ट्रपति भवन से विशेष आमंत्रण मिलने पर जब यह दंपत्ति दिल्ली पहुंचा और देश के प्रथम नागरिक से मुलाकात की, तो उनके बीच नौ साल पुराना एक पुराना और गहरा रिश्ता एक बार फिर जीवंत हो उठा। इस हृदयस्पर्शी मुलाकात ने यह साबित कर दिया कि संवैधानिक पदों पर बैठे सर्वोच्च व्यक्ति भी जनसामान्य के दुखों और उनकी संघर्ष भरी कहानियों को कितनी गहराई से याद रखते हैं, जिसने पूरे झारखंड राज्य समेत देश भर में मानवता की एक अनूठी मिसाल पेश की है।
नौ साल पुराना नाता: कैसे शुरू हुई थी झारखंड की कलावती और राष्ट्रपति मुर्मू की कहानी?
इस अनूठे और मार्मिक रिश्ते की कहानी करीब नौ साल पुरानी है, जब द्रौपदी मुर्मू झारखंड राज्य की राज्यपाल थीं। उस समय पारिवारिक संघर्ष, पति की गंभीर बीमारी और भारी आर्थिक तंगी के बीच कलावती देवी का जीवन बेहद कठिन दौर से गुजर रहा था। कलावती के पति दिलीप महतो लंबे समय से गंभीर रूप से बीमार थे और परिवार के भरण-पोषण का कोई साधन नहीं बचा था। ऐसे समय में जब कलावती मदद की गुहार लेकर तत्कालीन राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू से मिलने पहुंची थीं, तो महामहिम ने एक अभिभावक और मां की तरह न केवल उनकी पूरी बात सुनी थी, बल्कि उनके परिवार को हरसंभव संबल और व्यक्तिगत सहायता भी प्रदान की थी। राज्यपाल रहते हुए द्रौपदी मुर्मू ने जिस संवेदनशीलता का परिचय दिया था, उसने कलावती के परिवार को बिखरने से बचा लिया था। हालांकि समय के चक्र के साथ राजभवन से राष्ट्रपति भवन तक का सफर तय करने के बावजूद महामहिम उस साधारण परिवार के संघर्षों को भूली नहीं थीं।
दीपावली के पावन अवसर पर राष्ट्रपति भवन से मिला विशेष बुलावा
समय बीतता गया और द्रौपदी मुर्मू देश की राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर आसीन हो गईं, लेकिन उनके मन में झारखंड के आम और जरूरतमंद लोगों के प्रति वही आत्मीय स्नेह आज भी जीवित है। इस दीपावली से ठीक पहले जब राष्ट्रपति सचिवालय से कलावती देवी और उनके पति दिलीप महतो के पास दिल्ली आने का बुलावा पहुंचा, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। राष्ट्रपति भवन पहुंचने पर महामहिम राष्ट्रपति ने बेहद गर्मजोशी के साथ उस दंपत्ति का स्वागत किया। प्रोटोकॉल और औपचारिकताओं से परे हटकर राष्ट्रपति ने एक साधारण गृहिणी की तरह कलावती से उनके घर-परिवार, बच्चों की पढ़ाई और पति के स्वास्थ्य का हालचाल जाना। इस दौरान पुरानी यादें ताजा हो गईं और दोनों पक्षों की आंखें स्नेह से नम हो गईं। राष्ट्रपति ने खुद अपने हाथों से उन्हें दीपावली की उपहार सामग्री और मिठाइयां भेंट कीं।
झारखंड के सुदूर गांव से लेकर देश के सर्वोच्च पद तक मानवीय संबंधों की मिसाल
कलावती और दिलीप की यह कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे सच्चे मानवीय संबंध और संवेदनाएं सत्ता की ऊंचाइयों से परे जाकर दिलों को जोड़ती हैं। झारखंड के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाले इस दंपत्ति ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि देश की राष्ट्रपति उन्हें अपने आधिकारिक आवास पर बुलाकर इस तरह सम्मानित करेंगी। जब कलावती ने दिल्ली से वापस लौटने के बाद अपने गांव के लोगों को राष्ट्रपति के इस स्नेह और आत्मीय व्यवहार के बारे में बताया, तो पूरा गांव गर्व से भर उठा। स्थानीय लोगों का कहना है कि महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने सरल स्वभाव और जनहित के प्रति समर्पण से यह साबित कर दिया है कि वे भले ही देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर हैं, लेकिन उनकी जड़ें आज भी भारत की माटी और वहां के आम इंसानों से उतनी ही गहराई से जुड़ी हुई हैं।
हर देशवासी के लिए प्रेरणा बना राष्ट्रपति का यह आत्मीय और सरल व्यक्तित्व
दीपावली के इस पावन पर्व पर राष्ट्रपति भवन में हुई इस मुलाकात ने पूरे देश के सामने सादगी और अपनापन की एक बेहतरीन दास्तां पेश की है। आज के आधुनिक दौर में जहां लोग अपने पुराने रिश्तों और संघर्ष के दिनों को आसानी से भुला देते हैं, वहीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा एक साधारण ग्रामीण परिवार को इतने वर्षों बाद भी याद रखना और उन्हें त्योहार की खुशियों में शामिल करना यह सिखाता है कि पद और प्रतिष्ठा से ऊपर उठकर इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। झारखंड की कलावती और दिलीप के लिए यह दीपावली केवल रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि उनके जीवन का वह स्वर्णिम अध्याय बन गई है जो उनकी आने वाली पीढ़ियों को हमेशा संघर्ष के बाद मिलने वाली उम्मीद और प्रेरणा देता रहेगा।
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