देश में कैंसर, किडनी, हृदय रोग और दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों के महंगे इलाज के चलते हर साल लाखों परिवारों के गरीबी रेखा के नीचे चले जाने के गंभीर संकट पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने कड़ा संज्ञान लिया है। शीर्ष अदालत ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में यह गुहार लगाई गई है कि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली पेटेंटेड और अति-महत्वपूर्ण दवाओं के खुदरा मूल्यों पर कानूनी सीमा (Price Ceiling) तय की जाए ताकि वे आम नागरिकों की पहुंच में आ सकें। अदालत के इस हस्तक्षेप के बाद यह उम्मीद जगी है कि जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों पर सरकार को कोई ठोस विनियामक कदम उठाना पड़ सकता है।
याचिका का मुख्य आधार: संविधान का अनुच्छेद 21 और ‘राइट टू हेल्थ’
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में संवैधानिक प्रावधानों और मौजूदा स्वास्थ्य संकट को रेखांकित किया गया है:
- स्वास्थ्य का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा: याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त ‘जीने का अधिकार’ (Right to Life) केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सम्मानजनक जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार (Right to Health) भी शामिल है।
- इलाज के अभाव में मौत असंवैधानिक: यदि किसी मरीज की मृत्यु केवल इसलिए हो जाती है क्योंकि वह लाखों रुपये कीमत वाली कैंसर की दवा खरीदने में असमर्थ है, तो यह राज्य के कल्याणकारी दायित्व की विफलता है।
- दवा कंपनियों का भारी मुनाफा (High Trade Margins): याचिका में आरोप लगाया गया है कि बहुराष्ट्रीय और घरेलू दवा कंपनियां उत्पादन लागत की तुलना में 500% से लेकर 1000% तक के अत्यधिक व्यापारिक मुनाफे (Trade Margins) पर कैंसर रोधी दवाएं बेचती हैं।
क्या मौजूदा समय में कैंसर की दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं हैं?
भारत में आवश्यक दवाओं की कीमतें औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO) और राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची (NLEM) के तहत तय की जाती हैं:
- सीमित दायरा: वर्तमान में आवश्यक दवा सूची (NLEM) में कैंसर की लगभग 40 से 50 दवाएं ही शामिल हैं, जिनकी अधिकतम कीमत सरकार तय करती है।
- नई और एडवांस दवाएं बाहर: आधुनिक इम्यूनोथेरेपी (Immunotherapy), टार्गेटेड थेरेपी और बायोलॉजिकल्स (Biologicals) जैसी नई जीवन रक्षक दवाएं, जिनकी एक-एक डोज की कीमत ₹50,000 से ₹2.5 लाख तक होती है, वे अधिकांशतः मूल्य नियंत्रण से बाहर हैं।
- कस्टम ड्यूटी में हालिया छूट: हालांकि बजट में सरकार ने कैंसर की तीन प्रमुख जीवन रक्षक दवाओं (ट्रैस्टुजुमाब डेरक्सटेकन, ओसिमर्टिनिब और डुरवालुमाब) पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को शून्य कर दिया था, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल टैक्स छूट से खुदरा कीमतें आम आदमी के बजट में नहीं आ पातीं।
क्या वास्तव में मरीजों के ‘अच्छे दिन’ आने वाले हैं? 3 बड़े संभावित प्रभाव
यदि सुप्रीम कोर्ट के दबाव के बाद केंद्र सरकार कड़े नीतिगत कदम उठाती है, तो मरीजों को निम्नलिखित प्रत्यक्ष लाभ मिल सकते हैं:
- ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन (Trade Margin Capping): सरकार विनिर्माता स्तर से लेकर अंतिम खुदरा मूल्य (MRP) तक के मुनाफे को 30% से 50% के दायरे में सीमित कर सकती है, जिससे कई महंगी दवाओं की कीमतें रातों-रात 40% से 60% तक घट सकती हैं।
- अनिवार्य लाइसेंसिंग (Compulsory Licensing): गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की स्थिति में सरकार भारतीय पेटेंट अधिनियम की धारा 84 और 92 के तहत घरेलू कंपनियों को अत्यधिक महंगी विदेशी पेटेंट दवाओं के सस्ते जेनेरिक संस्करण बनाने की अनुमति दे सकती है।
- NLEM सूची का विस्तार: आवश्यक दवाओं की सूची में कैंसर की दूसरी और तीसरी पीढ़ी की दवाओं को अनिवार्य रूप से शामिल किया जा सकता है।
नीतिगत चुनौतियां: सरकार के सामने क्या है पेंच?
हालांकि दवाओं की कीमतें घटाना सीधा और आसान नहीं है। केंद्र सरकार को अदालत में अपना पक्ष रखते समय इन चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा:
- ग्लोबल फार्मा कंपनियों का विरोध: अंतरराष्ट्रीय दवा कंपनियों का तर्क रहता है कि नई दवाओं के शोध और विकास (R&D) में अरबों डॉलर खर्च होते हैं। यदि कीमतें बहुत कम कर दी गईं, तो वे भारत में नई दवाएं लॉन्च करना बंद कर सकती हैं।
- सप्लाई चेन का संकट: अत्यधिक मूल्य नियंत्रण से कई बार निर्माता उन दवाओं का उत्पादन कम कर देते हैं, जिससे बाजार में जीवन रक्षक दवाओं की कृत्रिम किल्लत (Shortage) पैदा होने का खतरा रहता है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जवाब मांगे जाने से गेंद अब पूरी तरह केंद्र सरकार के पाले में है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार हलफनामे में क्या कार्ययोजना पेश करती है और क्या वह मुनाफाखोर कंपनियों पर नकेल कसकर कैंसर से जूझ रहे लाखों मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों को इलाज के भारी-भरकम वित्तीय बोझ से वास्तविक मुक्ति दिला पाती है।
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