रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और रूस की सामरिक नीतियों का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि सदियों से मास्को की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक लालसा दुनिया के खुले और गर्म पानी के समुद्रों तक निर्बाध पहुंच हासिल करने की रही है। यदि इतिहास के पन्नों को गहराई से पलटें तो शीत युद्ध के दौर से ही सोवियत संघ और रूस की यह सर्वोच्च रणनीतिक प्राथमिकता रही है कि उसे हिंद महासागर या अरब सागर जैसे गर्म पानी के रास्तों पर अपनी नौसेना के लिए स्थायी ठिकाने मिल जाएं, ताकि आर्कटिक और बाल्टिक सागर की जमी हुई बर्फ से मुक्ति पाकर वैश्विक व्यापार तथा सैन्य आवाजाही पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया जा सके। इसी कड़ी में अब दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक गलियारों से एक बेहद चौंकाने वाली और भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को कई गुना बढ़ाने वाली खबर सामने आ रही है। ताजा कूटनीतिक और रक्षा समीकरणों के संकेतों के मुताबिक, पाकिस्तान ने पुतिन के इस चिर-प्रतीक्षित सपने को जमीन पर उतारने के लिए अपने सामरिक द्वार खोल दिए हैं और रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील ‘गर्म पानी’ के रास्तों तक रूस की पहुंच को आसान बनाने की गुप्त सहमति प्रदान कर दी है। इस घटनाक्रम को भारत की सुरक्षा के लिहाज से एक बहुत बड़ा और सीधा आघात माना जा रहा है, क्योंकि ग्वादर और अन्य पाकिस्तानी बंदरगाहों पर यदि रूसी प्रभाव बढ़ता है, तो इससे हिंद महासागर में भारत का पारंपरिक प्रभुत्व सीधे तौर पर चुनौती के दायरे में आ जाएगा। दोनों देशों के बीच तेजी से बदलते इन गठजोड़ों ने नई दिल्ली के रणनीतिकारों और रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है, क्योंकि यह कदम सीधे तौर पर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बुरी तरह से बिगाड़ने की क्षमता रखता है।
रूस की सदियों पुरानी सामरिक महत्वाकांक्षा और गर्म पानी के बंदरगाहों का इतिहास
रूस के भौगोलिक इतिहास पर नजर डालें तो उसके अधिकांश प्रमुख बंदरगाह साल के एक बड़े हिस्से में भारी बर्फबारी और कड़ाके की ठंड के कारण जमे रहते हैं, जिससे उसकी नौसेना और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की आवाजाही गंभीर रूप से बाधित होती है। यही कारण है कि रूस हमेशा से ऐसी भौगोलिक स्थितियों की तलाश में रहा है जहां उसे साल के बारह महीने खुले और गर्म पानी वाले समुद्र का तट मिल सके। अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के रूसी जारशाही शासन से लेकर सोवियत संघ के विघटन तक, मास्को ने हमेशा दक्षिण की ओर यानी फारस की खाड़ी और अरब सागर की तरफ बढ़ने की रणनीतिक योजनाएं बनाई थीं। अफगानिस्तान युद्ध के दौरान भी सोवियत संघ का एक छिपा हुआ उद्देश्य यही था कि वह किसी तरह से पाकिस्तान या बलूचिस्तान के तटों तक अपनी पहुंच बना सके, लेकिन उस समय अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी ताकतों के कड़े विरोध तथा क्षेत्रीय प्रतिरोध के कारण उनका यह सपना अधूरा ही रह गया था। वर्तमान समय में जब रूस पर पश्चिमी देशों के कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगे हुए हैं और वह यूक्रेन संघर्ष के बाद वैश्विक स्तर पर नए मित्र देश तलाश रहा है, तब उसे पाकिस्तान के रूप में एक ऐसा साझीदार मिल गया है जो अपनी रणनीतिक मजबूरियों और भारत विरोधी एजेंडे के तहत मास्को को गर्म पानी के रास्तों तक आमंत्रित करने से भी जरा संकोच नहीं कर रहा है। रूस की यह भू-राजनीतिक मजबूरी और पाकिस्तान की कूटनीतिक अवसरवादिता मिलकर दक्षिण एशिया में एक नए और खतरनाक समीकरण को जन्म दे रही है।
पाकिस्तान द्वारा रास्तों का खुलापन और ग्वादर बंदरगाह की बदलती हुई भूमिका
पाकिस्तान पिछले कुछ वर्षों से अपनी चरमराती अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार की भारी कमी से जूझ रहा है, जिसके चलते वह अपनी सामरिक परिसंपत्तियों को विदेशी ताकतों के पाले में गिरवी रखने से भी पीछे नहीं हट रहा है। चीन के साथ उसकी ‘CPEC’ परियोजना के तहत ग्वादर बंदरगाह पहले से ही बीजिंग के रणनीतिक नियंत्रण और प्रभाव के साये में है, जहां चीनी नौसेना के दखल की आशंकाएं हमेशा बनी रहती हैं। अब इस समीकरण में रूस की एंट्री ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है, क्योंकि पाकिस्तान ने कथित तौर पर रूसी जहाजों और ऊर्जा आपूर्ति वाहकों के लिए अपने जलमार्गों और तटीय बुनियादी ढांचे के इस्तेमाल को हरी झंडी दिखा दी है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की इस नीति के पीछे मुख्य उद्देश्य भारत पर सामरिक दबाव बढ़ाना और वैश्विक मंचों पर अपनी अहमियत को जबरन साबित करना है। जब पाकिस्तानी हुक्मरान रूस को अपने गर्म पानी के तटों और व्यापारिक गलियारों तक पहुंच प्रदान करते हैं, तो वे यह भूल जाते हैं कि इसके दूरगामी परिणाम पूरे दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप की शांति और स्थिरता पर भारी पड़ेंगे। इस प्रकार, पाकिस्तान की जमीन और उसके समुद्री मार्गों का उपयोग करके यदि रूस हिंद महासागर के मुहाने तक अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर लेता है, तो यह पाकिस्तान की तरफ से भारत की सुरक्षा और संप्रभुता पर एक बहुत बड़ा और खुला प्रहार माना जाएगा।
भारत की दुखती ‘रग’ पर सीधा वार और नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताएं
भारतीय कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के जानकारों के लिए पाकिस्तान और रूस के बीच बढ़ती यह नजदीकियां बेहद गंभीर चिंता का विषय बन गई हैं। भारत और रूस के संबंध पारंपरिक रूप से दशकों से अत्यंत मजबूत, भरोसेमंद और रणनीतिक साझेदार वाले रहे हैं, जहां रक्षा खरीद और ऊर्जा सुरक्षा के मामलों में मास्को हमेशा नई दिल्ली का सबसे बड़ा मददगार रहा है। हालांकि, बदलते वक्त में जब रूस और पाकिस्तान एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं और पाकिस्तान रूस को अपने गर्म पानी के रास्तों का एक्सेस दे रहा है, तो इसे भारत की एक संवेदनशील ‘रग’ पर सीधा वार माना जा रहा है। भारत के पश्चिमी तट और अरब सागर की सुरक्षा व्यवस्था हमेशा से भारतीय नौसेना की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल रही है, क्योंकि इसी क्षेत्र से देश का अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल आयात संचालित होता है। यदि पाकिस्तान के जरिए रूसी युद्धपोत या रणनीतिक पनडुब्बियां अरब सागर और हिंद महासागर के करीब पहुंचती हैं, तो भारतीय नौसेना को अपनी सुरक्षा रणनीतियों में भारी फेरबदल करना पड़ेगा। इसके अलावा, कूटनीतिक मोर्चे पर भी भारत के सामने यह एक बड़ा धर्मसंकट की स्थिति है कि वह अपने पुराने और भरोसेमंद दोस्त रूस के इस कदम पर किस तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करे, क्योंकि मास्को के साथ दोस्ती बनाए रखना भी भारत की वैश्विक ऊर्जा और रक्षा जरूरतों के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि अपनी सीमाओं की सुरक्षा करना।
दक्षिण एशिया में नए भू-राजनीतिक गठजोड़ और भविष्य के खतरनाक परिणाम
पाकिस्तान और रूस के बीच पनप रहे इस नए सामरिक गठजोड़ ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका, पश्चिमी देशों और खाड़ी के अन्य प्रमुख देशों की भी धड़कनें बढ़ा दी हैं। अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी इस बात पर पैनी नजर रख रहे हैं कि कैसे रूस प्रतिबंधों से बचने के लिए वैकल्पिक व्यापारिक और नौवहन मार्गों का उपयोग कर रहा है। दूसरी ओर, चीन भी यह नहीं चाहेगा कि हिंद महासागर क्षेत्र में उसके अलावा किसी अन्य महाशक्ति यानी रूस का दखल इतना बढ़ जाए कि बीजिंग का प्रभाव कम होने लगे। ऐसे में, पाकिस्तान इन महाशक्तियों के बीच एक ऐसा खेल खेल रहा है जहाँ वह थोड़े बहुत आर्थिक और सामरिक लाभ के लिए पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर पर धकेल रहा है। यदि रूस वास्तव में पाकिस्तान के रास्ते गर्म पानी के समुद्रों पर अपनी दीर्घकालिक उपस्थिति दर्ज कराने में सफल हो जाता है, तो यह शीत युद्ध के बाद के दौर का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव साबित होगा। आने वाले समय में भारत को अपनी नौसैनिक क्षमताओं को और अधिक आधुनिक बनाने के साथ-साथ कूटनीतिक स्तर पर भी रूस के साथ बहुत ही सधा हुआ संवाद स्थापित करना होगा, ताकि मॉस्को को यह अहसास कराया जा सके कि भारत की सुरक्षा कीमत पर इस प्रकार के क्षेत्रीय गठजोड़ नई दिल्ली के लिए अस्वीकार्य हैं। इस प्रकार, पुतिन के बरसों पुराने सपने को पूरा करने की यह कवायद दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता के भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बनकर उभर रही है।
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